बचपन की छांव

बचपन की छांव

गर्मियों की छुट्टियाँ…
हमारे आम के बागान की गहरी छाँव में बिछी चटाइयाँ,
उनके नीचे आड़े-तिरछे पड़े हम सब नटखट—बच्चों की परछाइयाँ।

किसी के हाथ में चंपक,
किसी के हाथ में लोटपोट,
किसी के हाथ में चाचा चौधरी,
तो किसी के हाथ में टिंकल का रंगीन कोना।

सब मन ही मन पढ़ते जाते,
थोड़ा-सा मुस्कुराते, फिर ठहाके लगाते,
एक-दूजे की किताबों में झाँकते,
चित्रों में से कहानियाँ चुपके-चुपके चुराते,
और फिर उन्हीं पन्नों में खो जाते।

हर बार वो डेढ़ महीना, डेढ़ दिन-सा गुजर जाता,
दोपहर की धूप, शाम की आँधी-तूफ़ान—बिना बताए आता-जाता।
बाग़ की पगडंडी से नहर तक की दौड़,
नीम के ऊपर पकड़म-पकड़ाई का शोर।

चिंता केवल सुबह समय पर खेलने जाने की,
फिक्र भी बस गेंद खो जाने की।
चोर-सिपाही से चंगा-पै तक की जय,
शरारतों के राजा की हो जय!

चप्पल कहाँ गई—पता नहीं,
बाल कब सुलझे—पता नहीं,
खाना किसके घर खाया—पता नहीं,
और माँ को भी हमारा ठिकाना—पता नहीं!

हा-हा… वो बेफिक्री, वो बचपन,
नासमझी की समझ, खेल में सीखना—सीख में खेल की उलट-पलट ।

आज शाम जब ये यादें मन पर छाईं,
तो मुस्कुराते हुए हमने – ये प्यारी-सी कविता बनाई।
कुछ आपकी बचपन यादें ???

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