अंतर निर्वात

अंतर निर्वात

यह शून्य है या खालीपन की छाया?
जब तुम्हें एकांत ही प्रिय था,
तो फिर इस निःसंगता से भय क्यों?

यह कैसी उलझन की गिरह,
यह कैसी व्याकुलता की धधकती रेखा,
यह कैसी कश्मकश—
जो अंतरतम में अनुगूँज बनकर
स्वरहीन पुकार जगाती है—फिर वहीं पर दब जाती है।

कौन-सी खोज है जो पूर्ण नहीं होती,
कौन-सा रिक्ति-आकाश है
जो भरने का नाम नहीं लेता?
अंतर का यह निर्वात
मानो स्वयं को ही खोजता और उलझाता फिरता।

यदि तलाश को दिशा का दीप मिल जाए,
तो प्रतीक्षा का अंधकार क्षीण हो जाए।
अहम् से हम तक की यह यात्रा
क्षण-भर में भी सिमट जाए,
या फिर वर्षों की साँप-सीढ़ी-सी
चढ़ती-उतरती अनवरत चलती ही जाए।

तृप्ति का अमृत तभी प्राप्त हो,
जब प्यास भी सत्य और सजग हो।
मरहम का स्पर्श तभी शीतल हो,
जब घाव का बोध भी स्पष्ट हो।

अब और विलंब का अवकाश नहीं,
काल की धारा तीव्र बह रही है।
अब निद्रा त्यागनी होगी—
अंतर के सूर्य को उदित करना होगा।
अब चेतना को जागना होगा,
अंत के आगे के जीवन को पहचानना ही होगा,
और इस जीवन को समय रहते
अपने-अपने हाथों से थामना ही होगा।

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